उत्तराखंड

राज्य स्थापना दिवस: आंदोलनकारियों के गुनहगारों को आखिर कब मिलेगी सजा ?

उत्तराखंड को बने बीस साल हो गए। इस दौरान चार सरकारें राज करके चलीं गईं। पांचवीं सरकार सत्ता पर काबिज है। लेकिन, 1994 के मुजफ्फरनगर कांड के आरोपियों को अभी तक उनके अंजाम तक पहुंचाने में किसी ने गंभीरता से दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

उत्तराखंड के आंदोलनकारियों के दमन और मां-बहनों की अस्मत रौंदने वाले पुलिस-प्रशासन के बड़े से लेकर छोटे कारिंदों का अब तक कुछ नहीं बिगड़ा। कई आरोपी और बड़े रसूखदार होकर रिटायर हो गए।

कुछ अहम गवाहों की हत्या हो गई। वर्षों से जो कुछ बचे-खुचे मामले मुजफ्फरनगर की अदालतों में चल रहे हैं, इनकी पैरवी पर यहां की सरकारों की ओर से प्रयास नहीं करने से अब आंदोलनकारियों के गुनहगारों को सजा मिलेगी, इस पर संदेह है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जुगरान ने दायर की है रिट: 

मुजफ्फरनगर कांड के 26 साल बाद भी राज्य आंदोलनकारियों के गुनाहगारों को सजा नहीं मिल पाई है। इससे राज्य आंदोलनकारी आहत हैं।  राज्य आंदोलनकारी और युवा कल्याण परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष रविंद्र जुगरान ने 2 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। इस मामले में न्याय मिलने में देरी को देख फैसला देने, मुजफ्फरनगर की कोर्ट में आंदोलनकारियों से जुड़े सभी मामलों को उत्तराखंड में शिफ्ट करने का अनुरोध किया था। इस याचिका पर ही हाईकोर्ट ने इन मामलों के दस्तावेज तलब किए, लेकिन अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है।

यह कानूनी प्रक्रिया इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं हो सकता। भाजपा सरकार आंदोलनकारियों के सपने को साकार करने को कृत संकल्प है। इसी कड़ी में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है। अब गैरसैंण और आसपास के क्षेत्र के विकास को सरकार प्राथमिकता दे रही है।