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तो क्या शिव जटा से निकलता है गंगा के साथ आरबीएम ?

– यदि जांच हो तो 2जी स्पैक्ट्रम से भी भी बड़ा है खनन घोटाला
– प्रदेश के खनन बंद, लेकिन कैसे चल रहे 110 स्टोन क्रशर
– अवैध खनन से प्रदेश को हर साल 350 करोड़ राजस्व की चपत

उद्यमी और राज्य आंदोलनकारी
मान्यता है कि भगवान शिव की जटाओं से गंगा निकलती है लेकिन उत्तराखंड राज्य में शिव जटा से गंगा के साथ ही आरबीएम भी निकलता है जो सीधे मेरे राज्य के क्रशरों में जाती है। क्रशर भले ही वैध खनन के लिए बंद हों, लेकिन यहां अवैध खनन के लिए कोई रोक-टोक नहीं है। उत्तराखंड में वैध खनन बंद है और धड्डले से अवैध खनन चल रहा है। यदि राज्य में पिछले 20 साल और यूपी काल से खनन घोटाले की जांच हो तो खनन विभाग के अधिकारियों और उनके रिश्तेदारों के करोड़ों अवैध संपत्ति का पता चल सकता है। अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड का यह घोटाला दो लाख करोड़ का निकलेगा। आज सवाल यह है कि जब राज्य में वैध खनन हो ही नहीं रहा है तो 110 क्रशर कैसे चल रहे है? स्टाक का खेल होता है और इसमे खनन, ंवन, पुलिस और राजस्व विभाग का खेल होता है। मेरी सरकार से यह मांग है कि राज्य गठन से अब तक जितने भी नेता और अफसरों की खनन विभाग में तैनाती हुई है, उनकी संपत्ति की जांच हो। खनन विभाग से जुड़े अफसरों और नेताओं ने करोड़ों की संपत्ति अर्जित कर ली है।

खनन पट्टों के लिए मुसीबत का सबब है नियम
प्रदेश के 13 जिलों में लगभग 5819 हेक्टयर भूमि पर खनन कार्य होता है। इसमें 15 हेक्टेयर वन भूमि में पट्टे हैं। प्रदेश में 283 स्टोन क्रशर हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश में 110 स्टोन क्रशर चलते हैं। एनजीटी ने गंगा किनारे खनन कार्य पर रोक लगाई है। यह रोक राजाजी नेशनल पार्क के इस किलोमीटर की परिधि में है। इसके लिए वाइल्ड लाइफ विभाग की अनुमति लेनी होती है। साथ ही खनन पटटा क्षे़त्र में पुल से एक किलोमीटर अपस्ट्रीम और एक किलोमीटर डाउन स्ट्रीम में खनन प्रतिबंधित है। चूंकि उत्तराखंड में 65 से 75 प्रतिशत वनभूमि है। इस कारण वैध खनन में व्यवहारिक दिक्कत हैं। हरिद्वार में एक एनजीओ से जुड़े लोग पश्चिमी यूपी और हरियाणा के माफिया के इशारे पर धरना-आमरण अनशन करने बैठ जाते हैं। कारण, यदि प्रदेश में वैध खनन होगा तो हमें सहारनपुर, पोंटा या किसी अन्य स्थान से खनिज नहीं लेने होंगे और उनका धंधा चैपट हो जाएगा। इसलिए हरिद्वार में खनन का विरोध होता है।

उपखनिज में स्टाक का करोड़ों का काला कारोबार
सवाल यह है कि जब खनन बंद है तो यहां स्टोन क्रशर चल कैसे रहे हैं? डोईवाला, भानियावाला, रानीपुर, भोगपुर, रामपुर, रायघटी में ये क्रशर चल रहे हैं। यहां क्रशर दिन रात चलते हैं लेकिन एनजीटी को दिखाए गये स्टाक की मात्र वही रहती है। आखिर कैसे? दरअसल यह स्टाॅक का खेल है। स्टाॅक का यह खेल करोड़ों रुपये का काला कारोबार है। वन विभाग, पुलिस, खनन और राजस्व विभाग की मिलीभगत से अवैध खनन का कारोबार होता है। एक गाड़ी से तीन हजार रुपये की वसूली होती है। रायल्टी भी 28 रुपये की कटती है और इसमे ंचार बार वाहन दौड़ा दिया जाता है यानी सरकार को चारों ओर से नुकसान होता है। रात भर अवैध खनन होता है और दिन में क्रशरों में यह उपखनिज ठिकाने लगा दिया जाता है। हरिद्वार से भागूवाला तक यह खेल होता है। खेतों के गड्ढे बरसात के पानी से फिर भर जाते हैं या आरबीएम पूरा हो जाता है। पहाड़ों से नदियां रेत, पत्थर बहा कर लाती हैं और खनन के खिलाड़ियों को दोबारा अवैध खनन के लिए प्रकृति और गंगा का सहारा मिल जाता है। इस पूरे खेल में लाभ खनन माफिया के साथ खनन, वन, पुलिस और राजस्व विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को मिलता है लेकिन सरकार को भारी नुकसान होता है।

सरकार से की है गुहार, हमारी भी सुन लो सरकार
मैंने इस संबंध में मुख्यमंत्री को गत वर्ष एक पत्र लिखा था कि यदि प्रदेश में वैध खनन होगा तो लोगों को रोजगार भी मिलेगा और सरकार को हर साल लगभग 350 करोड़ का राजस्व मिल सकता है। इसमें मैने यह लिखा था कि किस तरह से विधिसम्मत आरबीएम की निकासी हो सकती है। रिवर टेªनिंग कार्य कंपनी से कराया जाना चाहिए, विकास कार्यों के लिए उपखनिज की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित की जाए, रायल्टी व्यवस्था में सुधार, खनन नीति में बदलाव और पट्टाधारकों की बकाया धनराशि का समायोजन करने का सुझाव दिया गया था। मेरा दावा है कि यदि सरकार खनन नीति में पारदर्शिता लाए तो सरकार को 1700 से दो हजार करोड़ का राजस्व मिल सकता है। लेकिन सरकार का अब तक इस दिशा में दून वैली एक्ट हटाने के अलावा कोई सकारात्मक प्रयास नहीं है। सरकार की उपेक्षा और लापरवाही के कारण प्रदेश को एक ओर जहां अरबों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है वहीं हजारों लोगों को रोजागर से भी वंचित होना पड़ रहा है। इसके अलावा खनन माफिया को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन मिल रहा है।